सागर लङ्घन सङ्कुल वानर कुलमवलोक्य निजस्तुति लोलम्
जलधर चुम्बि महाकृतिरेक पदक्रम लङ्घित जलनिधिरेवम्
रधुपतिमानन्दयसिच सीता कुशल निवेदन गुतघन शोकम्
कोनहि वेत्ति कपीश जगद्यति सङ्कट मोचन नामतवेदम् ॥१॥
अहिकुल बन्धन मोहित दाशरथीद्वयमालोक्य मनोविकलम्
खगपति मानयसिस्म विकुण्ठ उरगतमस्त्र विमोचन दक्षम्
पुनरायोधन बलिनं महसिच भुजयुग रूढं सोदर युग्वम्
कोनहि वेत्ति कपीश जगद्यति सङ्कट मोचन नामतवेदम् ॥२॥
मूर्छित लक्ष्मण बोध समर्थ महौषधि सञ्जीवीलतां नेतुम्
उत्पदसि क्षणमद्रिमुपानयसिस्म करेणतमिव सुमगुच्छम्
उत्तिथ लक्ष्मण करयुग वंदन मालिङ्गसि विहसंच सरागम्
कोनहि वेत्ति कपीश जगद्यति सङ्कट मोचन नामतवेदम् ॥३॥
शतमुख रावण हुतरघुनायक मम्बाबलिपशु मुपगत मोहम्
पुनरानयसिचतमसुर मपगत जीवं विधाय पातालेशम्
राघव शरमुर्ध्वमुखं कृत्वा नम्रं हरसिचयुधि दशकण्ठम्
कोनहि वेत्ति कपीश जगद्यति सङ्कट मोचन नामतवेदम् ॥४॥
शृङ्खलयानियत शनैशचरमपि मोचयसिस्म शुच सहसातम्
कोमेसङ्कट इह हनुमन्गुरु सोदरमामवदल्यादीनम्
कथमपियोग्यो नाहमकारण करुणैव तवहि कारणमेकम्
कोनहि वेत्ति कपीश जगद्यति सङ्कट मोचन नामतवेदम् ॥५॥
वानरसिंहखगेशवराह हयानन पञ्चानन शिवरूपम्
वैष्णवतिलकं भविष्यजगतां धातारन्त्वां नमामिदेवम्
त्रिमुर्तितत्वं साक्षाद्दत्तं परमब्रह्महि लीलादासम्
कोनहि वेत्ति कपीश जगद्यति सङ्कट मोचन नामतवेदम् ॥६॥
हे गणकांशुक काञ्चनकुण्डल वन्दे त्वांहनुमन्तमनन्तम्
हे पिङ्गलाक्ष सद्गुण सागर मामवसततं मायामूढम्
हे मेरूगिरि समुज्ज्वलविग्रह मालयमान्तव पदयुगलोलम्
कोनहि वेत्ति कपीश जगद्यति सङ्कट मोचन नामतवेदम् ॥७॥
सङ्कट मोचन हनुमद्देव महास्तुति वेतां गायतिनित्यम्
योमनुज सः समेतिशतायु बलमारोग्यं तेजोधैर्यम्
शतशत सङ्कट जालमपि क्षणमेव विनश्यति याति स तोषम्
कोनहि वेत्ति कपीश जगद्यति सङ्कट मोचन नामतवेदम् ॥८॥
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Monday, February 23, 2009
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