प्रस्थितं हि। प्रस्थितं हि। श्री विष्णु चक्रम प्रस्थितं हि।
अग्निकण विद्युत्दीधिति शोण श्वेत नील धारारुची।
स्वार्थ पर्वतं खण्डयति लोभ गुणञ्च चूर्णयति।
संरक्षित शक्रं परिखण्दित नक्रम्। हत सर्व वक्रं श्री सुदर्शन चक्रम्॥
कार्तवीर्यार्जुन स्वरूपं सर्व देवता दत्त धूपम्।
दग्ध पञ्च महापापं नारायण हृदय दीपम्।
दत्त भक्ताय वीराय कार्तवीर्यार्जुनायते।
सहस्र बाहवे कुर्यां सहस्रं वन्दनान्यहम्।
ॐ कार्तवीर्याय विद्महे सहस्र कराय धीमहि। तन्नो हैहय प्रचोदयात्॥
Monday, March 9, 2009
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment