Tuesday, March 10, 2009

॥श्री राहु-केतु नमनम्‌॥

नमोनमो श्री राहुकेतुभ्याम।

नमोनमो राहु केतुभ्याम॥
रवि शशि ग्राहकाभ्याम राक्षस शरीरार्ध भागाभ्याम्‌।
महासर्पमस्तक कायाभ्यां महीवलयछाया ग्राभ्याम्‌।
महा महा पराक्रमाभ्याम्‌॥

नमोनमो राहुकेतुभ्या।
दुष्कर्म फलदान दुताभ्याम दुर्जन गुण परिवर्तन रक्षाभ्याम्।
दीनजनार्ति भक्तिदायकाभ्याम्।

नमोनमो राहुकेतुभ्याम्।
अपसल्य जिवर्ध्य अपसल्य जराभ्याम्।
तमोगुण नाशाय तमोग्रहाभ्याम्।
असुररूप जनार्ध असुरायिताभ्याम्॥

नमोनमो राहुकेतुभ्याम्।
कयानश्चित्त केतुम ग्रुन्वन मन्त्रमंदिराभ्याम्।
मासपूप कुलु थपाकदान प्रशमिदाभ्याम्।
भानु वासर नागरूप कन्द पूजा प्रियाभ्याम्॥

नमोनमो राहुकेतुभ्याम्।
परमपद सोपान मार्ग परिक्षा पन्नकाभ्याम्।
कुटिल कुण्डलिनी वृत्ति भुजगि शासगोरकाभ्याम्।
कष्ट प्रदान परिणकिपरिणाम मोक्षप्रदाभ्याम्॥

नमोनमो राहुकेतुभ्याम्।
रवि शशि ग्राहकाभ्याम राक्षस शरीरार्थ राजाभ्याम्॥

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